Bihar MLC BJP Result News : बिहार की राजनीति में लंबे समय से BJP का सबसे सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले राजधानी पटना और उसके आसपास के शहरी इलाकों में अब सियासी जमीन खिसकती नजर आ रही। हाल में आए चुनाव परिणामों ने पार्टी के भीतर बड़ी चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि एक समय जो इलाके पार्टी के लिए जीत की पक्की गारंटी माने जाते थे, वहां अब जनता का मोहभंग साफ दिखाई दे रहा है।

पटना शिक्षक एमएलसी सीट पर आरजेडी की बड़ी जीत

राजधानी की प्रतिष्ठित पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की MLC सीट पर 3 दशकों से BJP के दिग्गज नेता नवल किशोर यादव का एकछत्र राज था। नवल किशोर यादव ने पहली बार 1996 में इस सीट से चुनाव जीत दबदबा कायम किया था। इसके बाद से वह इस सीट पर काबिज थे। बीच के साल में वह RJD छोड़ BJP में शामिल हो गए थे। 2014 तथा 2020 में भी भगवा दल के टिकट पर जीत दर्ज करते आए थे। मगर, इस बार के चुनाव में RJD उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार सिंह ने लंबे सियासी समीकरण को पलट दिया। डॉ. संजीव सिंह ने नवल किशोर यादव को 1057 मतों से करारी शिकस्त दी। इस उलटफेर के साथ पटना शिक्षक निर्वाचन सीट पर 3 दशक पुराना BJP का वर्चस्व समाप्त हो गया है।

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भी बड़ा झटका

सिर्फ MLC चुनाव नहीं, बल्कि पटना के शहरी क्षेत्र की हॉट सीट मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट पर भी BJP को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा है। साल 1995 से ही जिसे पहले पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था, यह सीट बीजेपी का अभेद्य किला रही है। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से नितिन नवीन तक, इस सीट पर पार्टी का प्रभाव इतना मजबूत था कि इसे हमेशा सुरक्षित सीट माना जाता था। वैसे, हाल में जब नितिन नवीन के पार्टी अध्यक्ष बनने एवं राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद यह विधायक पद खाली हुआ और यहां उपचुनाव के नतीजे चौंकाने वाले आए। चुनावी मैदान में पहली बार उतरे जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर ने इस सीट पर बड़ी और निर्णायक जीत हासिल की। प्रशांत की इस एंट्री ने BJP के 3 दशक पुराने अजेय किले को तहस-नहस कर दिया।

हार के पीछे की मुख्य वजहें

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन लगातार झटकों के पीछे BJP का अति-आत्मविश्वास और स्थानीय मुद्दों की अनदेखी सबसे बड़ी वजह रही। BJP नेतृत्व ने पटना के शहरी और शिक्षक मतदाताओं को पूरी तरह सुरक्षित माना था, जबकि जमीनी स्तर पर लोगों के बीच गहरा असंतोष सुलग रहा था।

शहरी मतदाताओं का मोहभंग : पटना में जलजमाव, खराब बुनियादी ढांचा, बेरोजगारी और स्थानीय स्तर पर जनता की अनदेखी जैसे मुद्दों ने शहरी वोटर को पारंपरिक राजनीतिक निष्ठा से दूर कर दिया। अब मतदाता सिर्फ पुरानी सफलताओं या पार्टी के नाम पर वोट देने के बजाय बेहतर विकल्पों की तलाश में हैं।

शिक्षकों का गुस्सा : पटना शिक्षक MLC सीट पर मिली हार इस बात का संकेत है कि पुरानी पेंशन योजना, शिक्षकों के मानदेय, सेवा शर्तों व शिक्षा नीतियों से जुड़ी मांगों को लेकर शिक्षक वर्ग तथा बुद्धिजीवियों में सरकार के प्रति भारी नाराजगी थी। इसे RJD उम्मीदवार भुनाने में कामयाब रहे।

विकल्पों की तलाश : जन सुराज और अन्य निर्दलीयों के मैदान में आने से पारंपरिक वोटों में बिखराव हुआ। यह साबित हुआ कि पटना का वोटर अब बदलाव चाहता है।

BJP के लिए गहरी होती चुनौती

बिहार में अभी पार्टी के हाथों में सत्ता की कमान है और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में BJP के संगठनात्मक जनाधार और ताकत के मुख्य केंद्र माने जाने वाले पटना शहर से एक के बाद एक दो बड़े गढ़ों का हाथ से निकल जाना पार्टी आलाकमान के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है। यह हार केवल दो चुनावों में हुआ नुकसान भर नहीं, बल्कि इसका संदेश है कि पाटलीपुत्र के मतदाता अब सिर्फ अतीत के राजनीतिक इतिहास के आधार पर वोट देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में BJP के सामने अपने इस पारंपरिक सियासी दुर्ग को फिर दुरुस्त करने और जनता का खोया भरोसा वापस पाने की बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।