भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए आत्ममंथन की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि अदालतों में जरूरी मामलों की सुनवाई और सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और अनुमानित बनाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, न्याय और अन्याय के बीच अंतर कई बार अंतिम फैसले से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि अदालत ने जरूरत के समय हस्तक्षेप किया या नहीं। सीजेआई सूर्यकांत ने रविवार को केरल हाईकोर्ट के प्लेटिनम जुबली समारोह के उद्घाटन संबोधन में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट में लंबित मामलों की जल्द सुनवाई के लिए वादियों का सुप्रीम कोर्ट का रुख करना न्यायिक प्रक्रिया की जवाबदेही और प्रभावशीलता पर विचार करने का अवसर देता है।
जरूरी मामलों की पहचान और लिस्टिंग प्रक्रिया में सुधार पर जोर
सीजेआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट की संस्थागत स्वायत्तता और मामलों की सूची तय करने के उनके अधिकार का सम्मान करता है। इसके बावजूद, हाईकोर्ट में लंबित मामलों की जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में लगातार अनुरोध आना इस बात पर विचार करने का संकेत है कि प्रक्रिया को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या जरूरी मामलों की पहचान ज्यादा प्रभावी तरीके से की जा सकती है? क्या सुनवाई की सूची बनाने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और अनुमानित बनाया जा सकता है? क्या तकनीक की मदद से ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिनमें देरी से अपूरणीय नुकसान हो सकता है? सीजेआई ने यह भी पूछा कि क्या समय पर न्याय पाने का अवसर किसी व्यक्ति की इस क्षमता पर निर्भर होना चाहिए कि वह राष्ट्रीय राजधानी तक यात्रा कर सके।
न्याय की व्यवस्था केवल दिल्ली तक सीमित नहीं
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारत में संवैधानिक न्याय केवल नई दिल्ली से शुरू होकर वहीं खत्म नहीं होता। देश में 25 हाईकोर्ट का मजबूत नेटवर्क है, जिनमें से प्रत्येक को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं से सीधे जुड़े होते हैं। वे स्थानीय शिकायतों, क्षेत्रीय परिस्थितियों और सरकारी फैसलों के व्यावहारिक प्रभाव को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
अनुच्छेद 226 की अहमियत बताई
सीजेआई ने संविधान के अनुच्छेद 226 का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के पास मौलिक अधिकारों के अलावा अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए भी आदेश और निर्देश जारी करने की व्यापक शक्ति है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट कानूनी, वैधानिक, प्रशासनिक और संविदात्मक विवादों में प्रभावी राहत दे सकते हैं। समय पर अंतरिम राहत देना भी उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। कई मामलों में अदालत का समय रहते हस्तक्षेप किसी व्यक्ति को गंभीर नुकसान से बचा सकता है।
केरल हाईकोर्ट की 70 साल की यात्रा का जिक्र
केरल हाईकोर्ट के प्लेटिनम जुबली समारोह में सीजेआई ने अदालत के ऐतिहासिक योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि केरल राज्य और हाईकोर्ट दोनों का गठन 1956 में हुआ था और पिछले सात दशकों में दोनों की यात्रा एक-दूसरे से जुड़ी रही है। उन्होंने कहा कि केरल हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर अपने फैसलों के जरिए संवैधानिक सिद्धांतों को आम लोगों के जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सीजेआई ने 1999 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक लगाने वाले हाईकोर्ट के आदेश का भी उल्लेख किया। सीजेआई ने अंत में कहा कि देश की संवैधानिक अदालतों को अपनी स्वतंत्रता और अधिकार बनाए रखते हुए साझा उद्देश्य के लिए मिलकर काम करना चाहिए। उनके अनुसार, न्यायिक व्यवस्था की मजबूती का आधार समय पर न्याय, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और संस्थाओं के बीच समन्वय है।